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क्यों बढ़ती जा रही हैं तेल की कीमतें


-क्या सरकार बढ़ती कीमतों पर लगा पाएगी लगाम

- आइए जानते हैं क्यों बढ़ रही है तेल की कीमतें

- सरकार और तेल कंपनियों के लिए जरूरी या मजबूरी

XposeTimesNewsDesk. वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की बढ़ती कीमत और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी के बीच सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों (OMCs) ने सोमवार को एक बार फिर पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी की है। पिछले 10 दिनों में यह चौथी बार है जब पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़े हैं। हालांकि काफी लंबे समय बाद तेल की कीमतों में उछाल आया है। इसके पीछे का कारण है मिडिल ईस्ट में चल रहा विवाद। 15 मई को पहली बार तेल की कीमतों में वृद्धि हुई थी। तब से लेकर अब तक पेट्रोल 7.35 रुपये और डीजल 7.82 रुपये प्रति लीटर महंगे हो चुके हैं। तेल की बढ़ती कीमत यहीं थमेगी ये कहना मुश्किल है।

आईये जानते है तेल की बढ़ती कीमतों के पीछे क्या-क्या कारण है।

तेल अधिकारियों का कहना है कि इस बढ़ोतरी की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतें और रुपये के अवमूल्यन के कारण बढ़ी हुई आयात लागत है। ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) और भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) के अधिकारियों ने कहा कि कच्चे तेल की कीमतों में लगातार अस्थिरता और अंडर-रिकवरी (लागत से कम पर बिक्री) ने तेल खुदरा विक्रेताओं पर भारी दबाव बना दिया है।

मई महीने में कब-कब बढ़े दाम?

15 मई: पेट्रोल और डीजल की कीमतों में प्रति लीटर करीब 3 रुपये की वृद्धि हुई थी।
19 मई: पेट्रोल और डीजल के दाम में प्रति लीटर 90 पैसे की वृद्धि हुई थी।
23 मई: पेट्रोल की कीमत में 87 पैसे लीटर जबकि डीजल के दाम में 91 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई थी।
25 मई: पेट्रोल की कीमत में 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल के दाम में 2.71 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई।


पिछले दस दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चौथी बार बढ़ोतरी हुई है।

पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतें आम जनता के बजट को सीधे प्रभावित करती हैं। वैश्विक और घरेलू स्तर पर ऐसे कई जटिल कारक हैं, जो ईंधन के दामों को तय करते हैं। वर्तमान समय में पेट्रोल और डीजल के महंगे होने के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:

1. कच्चे तेल की वैश्विक कीमतें (Crude Oil Prices)

मांग और आपूर्ति: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की मांग के मुकाबले आपूर्ति कम होने से कीमतें बढ़ती हैं।

ओपेक (OPEC) के फैसले: तेल उत्पादक देशों का संगठन (OPEC) मुनाफा बढ़ाने या बाजार पर नियंत्रण रखने के लिए अक्सर तेल उत्पादन में कटौती कर देता है, जिससे कच्चे तेल के दाम बढ़ जाते हैं।

2. भू-राजनीतिक तनाव (Geopolitical Tensions)

युद्ध और संघर्ष: दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रों (जैसे मध्य पूर्व या रूस-यूक्रेन) में युद्ध, तनाव या राजनीतिक अस्थिरता के कारण तेल की सप्लाई चेन प्रभावित होती है। आपूर्ति बाधित होने के डर से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम तेजी से उछलते हैं।

3. भारी कर और टैक्स ढांचा (Tax Structure)

केंद्रीय उत्पाद शुल्क (Excise Duty): केंद्र सरकार प्रति लीटर ईंधन पर एक निश्चित उत्पाद शुल्क वसूलती है।

वैट (VAT) या राज्य कर: हर राज्य सरकार ईंधन पर अपने हिसाब से वैल्यू ऐडेड टैक्स (VAT) लगाती है। कई बार सरकारें अपने राजस्व (Revenue) को बढ़ाने के लिए टैक्स में कटौती नहीं करतीं, जिससे खुदरा कीमतें ऊंची बनी रहती हैं।

कुल कीमत का बड़ा हिस्सा: पेट्रोल-डीजल की मूल कीमत (Base Price) पर लगभग 40% से 50% तक केवल टैक्स होता है।

4. डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी

डॉलर में भुगतान: भारत अपनी जरूरत का लगभग 80-85% कच्चा तेल विदेशों से आयात (Import) करता है। इसका भुगतान अमेरिकी डॉलर में किया जाता है।

कमजोर रुपया: यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया कमजोर होता है, तो तेल कंपनियों को कच्चा तेल खरीदने के लिए अधिक रुपये खर्च करने पड़ते हैं। यह अतिरिक्त लागत अंततः उपभोक्ताओं पर डाल दी जाती है।

5. माल ढुलाई और डीलर कमीशन (Freight & Dealer Commission)

परिवहन लागत: रिफाइनरी से पेट्रोल पंपों तक ईंधन पहुंचाने का खर्च (Freight Charges) लगातार बढ़ता रहता है।

डीलर का मुनाफा: पेट्रोल पंप मालिकों (Dealers) को दिया जाने वाला कमीशन भी अंतिम उपभोक्ता मूल्य में जोड़ा जाता है।

निष्कर्ष

पेट्रोल और डीजल के दामों में बढ़ोतरी केवल किसी एक स्थानीय कारण से नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों, भू-राजनीतिक समीकरणों और घरेलू टैक्स नीतियों के मिले-जुले असर का परिणाम होती है। जब तक वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों (जैसे इलेक्ट्रिक वाहन और एथेनॉल ब्लेंडिंग) का उपयोग नहीं बढ़ता, तब तक ईंधन की कीमतें आम जनता के जीवन स्तर और महंगाई को इसी तरह प्रभावित करती रहेंगी।

मोदी सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम ₹3 बढ़ाकर एक बार फिर आम जनता पर महंगाई का बोझ डाल दिया है। हर बढ़ती कीमत का असर सीधे आम आदमी की जेब, रसोई और रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर पड़ता है। लेकिन सरकार के लिए जनता की परेशानी नहीं, सिर्फ टैक्स वसूली और इमेज बचाना ज़्यादा जरूरी है।

कितनी बढ़ी क्रूड ऑयल की कीमत

पिछले कुछ महीनों में वैश्विक स्तर पर क्रूड ऑयल (कच्चे तेल) की कीमतों में भारी उछाल आया है, जिसमें ब्रेंट क्रूड के दाम करीब $61 प्रति बैरल से बढ़कर $114-$138 प्रति बैरल के स्तर तक जा पहुंचे थे। हालांकि, हाल के दिनों में इसमें मामूली गिरावट देखी गई है, लेकिन यह पिछले कुछ महीनों के निचले स्तर की तुलना में अभी भी बेहद ऊंचे स्तर पर बना हुआ है।

क्रूड ऑयल के दामों में पिछले कुछ महीनों में आए बड़े उतार-चढ़ाव और बढ़ोतरी के मुख्य आंकड़े और कारण निम्नलिखित हैं:

1. कीमतों में बढ़ोतरी के मुख्य आंकड़े

ब्रेंट क्रूड (Brent Crude): वर्ष के शुरुआती महीनों में ब्रेंट क्रूड तेल की कीमत लगभग $61 प्रति बैरल के आसपास थी। मार्च और अप्रैल में ईरान से जुड़े पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के बंद होने से यह तेजी से बढ़कर $114 से $138 प्रति बैरल के उच्चतम स्तर तक पहुंच गया था।

सालाना अंतर (Year-on-Year): वर्तमान में मामूली गिरावट के बाद कच्चे तेल की कीमतें करीब $91 से $98 प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं, लेकिन ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स (Trading Economics) के अनुसार, यह स्तर अभी भी पिछले साल की समान अवधि की तुलना में लगभग 49.91% से 51.55% तक अधिक है।

2. पिछले कुछ महीनों में भारी बढ़ोतरी के मुख्य कारण

पश्चिम एशिया में युद्ध और तनाव: फरवरी के अंत से शुरू हुए अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच भू-राजनीतिक संघर्ष के कारण कच्चे तेल की वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई।

होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का बंद होना: वैश्विक समुद्री तेल व्यापार के इस सबसे महत्वपूर्ण रास्ते के बंद होने से बाजार से प्रतिदिन लगभग 14 मिलियन बैरल (वैश्विक आपूर्ति का करीब 14%) तेल बाहर हो गया, जिससे कच्चे तेल का बड़ा संकट पैदा हो गया।

ग्लोबल इन्वेंट्री में कमी: बार्कलेज (Barclays) और अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) की रिपोर्ट के अनुसार, तेल की मांग मजबूत रहने और उत्पादन में रुकावट आने के कारण वैश्विक तेल भंडारों में भारी गिरावट आई है, जिससे कीमतों को लगातार बढ़ावा मिल रहा है।

कच्चे तेल (Crude Oil) की बढ़ती कीमतें भारतीय अर्थव्यवस्था और तेल कंपनियों (OMCs) को सीधे और गहराई से प्रभावित करती हैं। चूँकि भारत अपनी तेल संबंधी ज़रूरतों का लगभग 85% हिस्सा विदेशों से आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाज़ार की हर छोटी-बड़ी हलचल देश के आर्थिक ताने-बाने पर असर डालती है।

भारतीय तेल कंपनियों जैसे इंडियन ऑयल (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) पर इसका वित्तीय असर इस प्रकार पड़ता है:

1. तेल कंपनियों के मुनाफे और मार्जिन पर चोट

अंडर-रिकवरी (Under-Recovery): जब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में क्रूड महंगा होता है, तो कंपनियों की तेल खरीदने और उसे रिफाइन करने की लागत (Cost Price) बढ़ जाती है।

कीमतें बढ़ाने पर पाबंदी: देश में महंगाई को काबू में रखने या राजनैतिक कारणों से सरकार अक्सर तेल कंपनियों को पेट्रोल-डीजल के खुदरा दाम (Retail Prices) बढ़ाने की पूरी आज़ादी नहीं देती। लागत बढ़ने और बिक्री मूल्य स्थिर रहने से कंपनियों को प्रति लीटर भारी नुकसान उठाना पड़ता है, जिससे उनका शुद्ध मुनाफा घट जाता है।

2. वर्किंग कैपिटल (Working Capital) का संकट

अधिक नकदी की ज़रूरत: डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी और क्रूड के ऊंचे दामों के कारण तेल कंपनियों को उतनी ही मात्रा में कच्चा तेल आयात करने के लिए बहुत अधिक नकदी (Cash) खर्च करनी पड़ती है।

कर्ज का बोझ: इस अतिरिक्त खर्च को पूरा करने के लिए कंपनियों को शॉर्ट-टर्म लोन (कम अवधि के कर्ज) लेने पड़ते हैं, जिससे उनके ऊपर ब्याज का बोझ बढ़ता है और उनकी बैलेंस शीट पर दबाव आता है।

3. भारतीय अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर

राजकोषीय घाटा (Fiscal Deficit): सरकार को तेल कंपनियों के नुकसान की भरपाई करने के लिए कभी-कभी सब्सिडी देनी पड़ती है या टैक्स एडजस्टमेंट करना पड़ता है। इससे सरकार के बजट और राजकोषीय घाटे पर बुरा असर पड़ता है।

व्यापार घाटा (Trade Deficit): महंगा तेल खरीदने के लिए भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा (अमेरिकी डॉलर) देश से बाहर जाती है। इससे देश का व्यापार घाटा बढ़ता है और भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले कमज़ोर होने लगता है।

चौतरफा महंगाई: पेट्रोल-डीजल महंगा होने से माल ढुलाई (Transportation Cost) महंगी हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप फल, सब्जियां, अनाज और रोज़मर्रा के इस्तेमाल की हर चीज़ के दाम बढ़ जाते हैं।

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