अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का
ऐलान सत्ता परिवर्तन के बाद ही रुकेगा ऑपरेशन
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ईरान खुद पर हुए हमले के बाद मिडिल ईस्ट के कई देशों पर दाग
रहा है मिसाइल
XposeTimesNewsDesk:
पश्चिम एशिया एक बार फिर से व्यापक संघर्ष के मुहाने पर
खड़ा दिखाई दे रहा है। शनिवार को अमेरिका और इजरायल ने संयुक्त रूप से ईरान पर हवाई
हमला कर दिया। इस हमले का निशाना ईरान का मिलिट्री ठिकाने रहे। ईरान ने पलट वार
करते हुए जवाब में इजरायल पर
मिसाइल से हमला बोल दिया। कुछ ही देर में ईरान ने अपने आधा दर्जन पड़ोसी देशों में
स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला शुरु कर दिया। मिसाइल और ड्रोन हमलों की इस
श्रृंखला ने न केवल सैन्य संतुलन को चुनौती दी है, बल्कि वैश्विक कूटनीति, ऊर्जा बाज़ार और अंतरराष्ट्रीय कानून पर भी गहरे सवाल खड़े
कर दिए हैं। इस हमले को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति ने साफ कर दिया है कि यह ईरान में
सत्ता परिवर्तन के लिए की जा रही कार्रवाई है, जो सत्ता परिवर्तन स्थापित करके ही
रुकेगी। साथ ही ईरान को परमाणु संपन्न नहीं होने देना है जो कि इजराइल के लिए खतरे
की घंटी है।
क्या है हमले की पृष्ठभूमि, परमाणु
विवाद से सैन्य टकराव तक
ईरान खुद को परमाणु संपन्न
देश बनने की चाह रखने के क्रम में परमाणु कार्यक्रम लंबे समय से चला रहा है। यह
मामला अंतरराष्ट्रीय निगरानी और विवाद का विषय रहा है। 2015 में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मध्यस्थता से हुए परमाणु
समझौते में IAEA (International Atomic Energy Agency) की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस समझौते के तहत ईरान ने अपने
परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने और निरीक्षण की अनुमति देने पर सहमति जताई थी।
हालांकि 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका को इस समझौते से अलग कर लिया और ईरान पर कठोर
आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इसके बाद ईरान ने भी चरणबद्ध तरीके से समझौते की शर्तों से
पीछे हटना शुरू किया। यूरेनियम संवर्धन के स्तर में वृद्धि ने इज़राइल की सुरक्षा
चिंताओं को और तीखा कर दिया।
इज़राइल लंबे समय से यह कहता
रहा है कि वह ईरान को परमाणु हथियार क्षमता हासिल नहीं करने देगा। क्योंकि इजराइल
नहीं चाहता कि उसके पड़ोसी देश जो दुश्मन है वह परमाणु बम संपन्न न होने पाये। इसी
रणनीतिक सोच के तहत उसने पूर्व में भी सीरिया और अन्य क्षेत्रों में ईरानी प्रभाव
वाले ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं।
‘शैडो वॉर’ से खुली जंग
तक
विश्लेषकों के अनुसार
इज़राइल और ईरान के बीच पिछले एक दशक से ‘शैडो वॉर’ यानी छाया युद्ध चल रहा था।
इसमें साइबर हमले, समुद्री
जहाजों पर संदिग्ध कार्रवाई, गुप्त
ऑपरेशन और सीमित हवाई हमले शामिल थे। ईरान की सैन्य संरचना में प्रभावशाली माने
जाने वाले IRGC (Islamic Revolutionary Guard Corps) पर क्षेत्रीय मिलिशिया समूहों को समर्थन देने के आरोप लगते
रहे हैं।
लेबनान में हिज़्बुल्लाह और
ग़ाज़ा में सक्रिय इस्लामिक आतंकवादी
संगठन हमास को लेकर
इज़राइल का मानना है कि ईरान अप्रत्यक्ष रूप से उसके खिलाफ बहुस्तरीय मोर्चा बनाए
हुए है। 2023
में हमास द्वारा इजरायल में हमला कर 1200 आम जनता की नृशंस
हत्या के बाद ग़ाज़ा पर इजरायल का कहर टूटा औऱ तनाव और बढ़ा, इस मामले में जब इज़राइल ने संकेत दिया कि वह ईरान की
“प्रत्यक्ष भूमिका” को अब बर्दाश्त नहीं करेगा। हालिया हमले इसी बढ़ते तनाव का चरम
रूप माने जा रहे हैं, जहां
प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई ने छाया युद्ध को खुली टकराव की स्थिति में बदल दिया है।
ईरान का पलटवार
ईरान पर हुए हमलों के तुरंत
बाद ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन से जवाबी कार्रवाई की। इज़राइल की वायु
रक्षा प्रणाली सक्रिय हुई, जबकि खाड़ी
क्षेत्र में स्थित अमेरिकी ठिकानों पर भी खतरे की स्थिति बनी रही। यह संकेत है कि
संघर्ष केवल दो देशों तक सीमित नहीं रह सकता।
ईरान की रणनीति स्पष्ट रूप
से “डिटरेंस” यानी प्रतिरोधक क्षमता दिखाने की रही है। संदेश यह है कि यदि उसके
क्षेत्र या नेतृत्व को निशाना बनाया जाएगा तो वह जवाब देने में सक्षम और इच्छुक
है। इससे पश्चिम एशिया में पहले से मौजूद अस्थिरता और बढ़ गई है। हालांकि ईरान एक
इस्लामिक मुल्क होने के बावजूद अपने पड़ोसी इस्लामिक देशों पर ही हमलावर हो गया है
जिससे मामला और ज्यादा खतरनाक होता जा रहा है।
अमेरिका की रणनीतिक दुविधा
अमेरिका की भूमिका इस पूरे
संकट में निर्णायक है। एक ओर वह इज़राइल की सुरक्षा का प्रबल समर्थक है, दूसरी ओर वह व्यापक क्षेत्रीय युद्ध से बचना भी चाहता है।
खाड़ी देशों में उसके सैन्य अड्डे मौजूद हैं, जो संभावित हमलों के दायरे में आ सकते हैं और आ भी रहे हैं।
अमेरिका के सामने चुनौती यह
है कि वह अपने सहयोगी के साथ खड़ा भी रहे और संघर्ष को नियंत्रित भी रखे। यदि यह
टकराव लंबा खिंचता है, तो अमेरिकी
सैन्य उपस्थिति और संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
वैश्विक असर: तेल, बाजार और कूटनीति
पश्चिम एशिया वैश्विक ऊर्जा
आपूर्ति का महत्वपूर्ण केंद्र है। किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष से कच्चे तेल की
कीमतों में तेज उछाल संभव है। पहले ही अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अस्थिरता देखी जा
रही है।
इसके अलावा, वैश्विक कूटनीति पर भी इसका असर पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र और
यूरोपीय देशों ने संयम बरतने की अपील की है। यदि संघर्ष और बढ़ता है, तो यह न केवल क्षेत्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के लिए
भी गंभीर खतरा बन सकता है।
भारत के लिए मायने
भारत दोनों पक्षों के साथ
संतुलित संबंध रखता है। एक ओर इज़राइल रक्षा सहयोग का महत्वपूर्ण साझेदार है, वहीं ईरान ऊर्जा और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं में अहम
भूमिका निभाता है।
कच्चे तेल की कीमतों में
वृद्धि भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव डाल सकती है। साथ ही खाड़ी देशों में रह रहे
लाखों भारतीयों की सुरक्षा भी एक प्रमुख चिंता बन सकती है। भारत के लिए यह समय
संतुलित कूटनीति और सावधानीपूर्ण रणनीति अपनाने का है।
आगे का रास्ता
वर्तमान हालात संकेत देते
हैं कि यदि त्वरित कूटनीतिक हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो स्थिति व्यापक युद्ध में बदल सकती है। दोनों पक्षों की
सैन्य क्षमताएं उच्च स्तर की हैं और प्रत्यक्ष टकराव के परिणाम विनाशकारी हो सकते
हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि
परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय
प्रभाव और सुरक्षा आशंकाओं का समाधान केवल सैन्य कार्रवाई से संभव नहीं है।
दीर्घकालिक समाधान के लिए बहुपक्षीय वार्ता, विश्वास बहाली और अंतरराष्ट्रीय निगरानी की भूमिका अहम
होगी।
पश्चिम एशिया में यह संकट केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन की परीक्षा भी है। आने वाले सप्ताह तय करेंगे कि यह टकराव सीमित रहेगा या इतिहास में एक बड़े युद्ध के रूप में दर्ज होगा जैसा कि दिख रहा है।
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