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बाग्लादेश
में हिन्दू युवक दीपू चंद्र दास की इस्लामिक भीड़ ने की लिंचिग
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मारने के
बाद पेड़ से लटकाया, फिर आग लगा दी, औऱ रस्सी से बांध कर सड़पर घसीटा
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XposeTimesNewsDesk. 1947,
जब भारत का विभाजन हुआ था, ये विभाजन संप्रदाय आधारित था, मुसलमान भारत में
हिन्दुओं के साथ रहना नहीं चाहते थे तो उन्हें एक अलग मजहबी मुल्क चाहिए था। इसके
लिए भारत में मुस्लिम लीग के दिशा निर्देशन में हिन्दुओं का कत्ल ए आम शुरु कर
दिया गया, अकेले बंगाल में दो से तीन दिनों में 40 हजार हिन्दुओं को काट डाला गया,
हजारों महिलाओं के साथ बर्बरता पूर्ण तरीके से बलात्कार हुआ, कई दिनों तक हिन्दुओं
के शवों को चील कौवे नोच रहे थे। ये सब उस जमीन पर हो रहा था जहां इस देश का तथाकथित
पिता बैठा हुआ था।
आज
भी कुछ बदला नहीं मजहबी कट्टरता जस की तस बनी हुई है, ताजा मामला है बाग्लादेश का
जो कभी भारत का हिस्सा था। यहां एक हिन्दू दीप चंद्र दास को मजहबी भीड़ ने तब तक
मारा जब तक उसने अपने प्राण नहीं छोड़ दिये, इसके बाद उसे बीच बाजार एक पेड़ पर
लटकाया गया और उसे जला दिया गया। इस कुत्सित मानसिकता की आक्रांतावादी कृत्य पूरे
सोशल मीडिया पर कौंध गयी। लेकिन पूरा विश्व अभी भी मौन साधे बैठा है। मानवाधिकार
की बात तो छोड़िये इस विभत्स घटना का संज्ञान भी शायद ही लिया गया हो।
दीपू चंद्र दास की कर दी मॉब लिंचिग
दीपू
चंद्र दास 25-30 साल का हिंदू युवक
था। वह मायमनसिंह शहर के भालुका इलाके में एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करता था और
अपने परिवार का एकमात्र कमाने वाला था, जिसमें उसके विकलांग
पिता, माँ, पत्नी और एक छोटा बच्चा
शामिल थे।
दीपू
पर पैगंबर मुहम्मद के बारे में अपमानजनक टिप्पणियाँ करने का झूठा आरोप लगाया गया
था। निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन के अनुसार, एक मुस्लिम सहकर्मी के साथ मामूली विवाद के बाद उस पर ये मनगढ़ंत आरोप
लगाए गए थे। इस आरोप के बाद जिहादियों की भीड़ ने उसे गुरुवार को अपना शिकार बनाया
और उसके साथ वहीं तालिबानियों वाला सलूक किया गया। समाचार ये भी सामने आया कि दीपू
को इन आरोपों के चलते पुलिस ने हिरासत में ले लिया था जिसका एक वीडियो भी वायरल है
जिसमें वह पुलिस स्टेशन में है औऱ बाहर उन्मादियों की भीड़ नारे लगा रही है, इसके
बाद वह कैसे भीड़ की गिरफ्त में आया ये सवाल उठ रहा है आरोप लगाया जा रहा है कि
पुलिस ने भी भीड़ के सामने घुटने टेक दिया या उनकी भी मिली भगत रही।
इसके
साथ हीजबकि उस्मान शरीफ हादी की हत्या के लिए न्याय की मांग कर रहे कुछ हिंसक
प्रदर्शनकारियों ने ढाका में सौ किलोमीटर से भी ज़्यादा दूर प्रमुख जगहों पर
तोड़फोड़ की।
दास
की लिंचिंग के बाद, उनके बेजान
शरीर को एक पेड़ से बांधकर आग लगा दी गई, जिसमें दर्जनों लोग इस बर्बरता का जश्न मनाते दिखे।
एनडीटीवी
की रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित के पिता ने घटना बताते हुए निराशा जताई, हालांकि मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने लिंचिंग की निंदा
की और कार्रवाई का आदेश दिया। रविलाल दास ने बताया, "सरकार की तरफ से किसी ने कोई आश्वासन नहीं दिया। किसी ने
कुछ नहीं कहा," उन्होंने
बताया कि उन्हें अपने बेटे की हत्या की खबर सबसे पहले फेसबुक से मिली।
दीपू
के पिता का कहना है कि "हमने फेसबुक से बातें सुनना शुरू किया, और फिर और लोग इसके बारे में बात कर रहे थे। हमें इसके बारे
में तब पता चला जब किसी ने मुझे बताया कि उसे बुरी तरह पीटा गया है। आधे घंटे बाद, मेरे चाचा आए और मुझे बताया कि वे मेरे बेटे को ले गए और
उन्होंने उसे एक पेड़ से बांध दिया,"
"फिर
उन्होंने उस पर केरोसिन डाला और आग लगा दी। उसका जला हुआ शरीर बाहर छोड़ दिया गया।
उन्होंने जले हुए धड़ और सिर को बाहर बांध दिया। यह भयानक था,"
वह
अभी तक भीड़ द्वारा की गई हत्या के पीछे के लोगों पर दोष नहीं लगा सके, चाहे वह जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश हो या उसका सहयोगी, छात्र शिबिर। "हम निश्चित रूप से नहीं कह सकते कि वे
छात्र शिबिर के थे या नहीं। कोई भी निश्चित नहीं हो सकता; लोग ऐसा कह रहे हैं।" इस घटना के सिलसिले में सिर्फ
सात लोगों को गिरफ्तार किया गया है।
बाग्लादेश भी पाकिस्तान की राह पर
बाग्लादेश
अब पूरी तरह से पाकिस्तान बन चुका है, पहले यह पूर्वी पाकिस्तान के नाम से जाना ही
जाता था। मजहबी कट्टरता, जिहाद, इस्लाम के नाम पर अल्पसंख्यकों की हत्या और
प्रतारणा। ये यहां के लिए आम बात हो चुकी है।
जब
बाग्लादेश में तख्ता पलट हुआ था उसके बाद हिन्दुओं के विरूद्ध खुलकर मुसलमानों ने
अपनी मजहबी कट्टरता का इजहार किया, हत्या, बलात्कार, लूट-पाट, सामुहिक हत्याएं ये
सब आम बात हो गयी, रफ्तार धीमी जरूर पड़ी लेकिन ये मजहबी उन्माद थमा नहीं और आज भी
जारी है।
दीपू
दास की पीट-पीटकर हत्या ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं की दुर्दशा की ओर ध्यान खींचा है, जिसमें आम चुनावों से कुछ महीने पहले गोली लगने से हादी की
मौत इस्लामिक कट्टरपंथियों के लिए अपनी हिंसा जारी रखने और उन संस्थानों को निशाना
बनाने के लिए एक ट्रिगर पॉइंट बन गई है जो उनकी विचारधारा के अनुरूप नहीं हैं।
शेख
हसीना सरकार में पूर्व सांसद और सूचना मंत्री मोहम्मद अली अराफ़ात ने इस बात पर
ज़ोर दिया है कि कैसे कट्टरपंथी इस्लामी ताकतें हादी की मौत पर विरोध प्रदर्शन की
आड़ में बांग्लादेश की सड़कों पर कब्ज़ा कर रही हैं।
उन्होंने
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक
पोस्ट में कहा, "हादी के
समर्थकों ने शुक्रवार (19 दिसंबर) को शाहबाग में शरीफ उस्मान हादी की हत्या के लिए
न्याय की मांग करते हुए धरना दिया। यह कार्यक्रम बाद में जिहादी और कट्टरपंथी
इस्लामी तत्वों के जमावड़े में बदल गया, जिसमें तौहीदी जनता के जशीमुद्दीन रहमानी और अताउर रहमान
बिक्रमपुरी जैसे नेता मौजूद थे। अन्य चरमपंथी समूहों के सदस्य भी मौजूद थे और
उन्होंने भड़काऊ भाषण दिए।"
उन्होंने
पोस्ट में आगे कहा, "जशीमुद्दीन
रहमानी,
जो एक जिहादी और अल-कायदा से जुड़े अंसारुल्लाह बांग्ला टीम
का प्रमुख है, को पहले अवामी लीग
सरकार के दौरान बांग्लादेश के आतंकवाद विरोधी कानून के तहत 2013 और 2016 के बीच
मारे गए नास्तिक ब्लॉगरों की हत्याओं का समर्थन करने के आरोप में हिरासत में लिया
गया था। उसे मौजूदा यूनुस के नेतृत्व वाले प्रशासन के तहत रिहा कर दिया गया है और
उसने सार्वजनिक रूप से उन हत्याओं के लिए अपने समर्थन को दोहराया और सही ठहराया
है।"