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दोनों देशों
के बीच ताइवान को लेकर बढ़ी तल्खी, जापान के प्रधानमंत्री के बयान से बौखलाया चीन
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युद्ध की स्थिति
में टोक्यो अमेरिका और अन्य सहयोगियों के साथ सैन्य हस्तक्षेप कर सकता है
वैश्विक
पटल पर एक और युद्ध के दस्तक देने की संभावना नजर आ रही है। ये दो देश है चीन और
जापान, दोनों के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। फिलहाल तो दोनों के बीच मौखिक युद्ध हो
रहा है दोनों के दूसरे को चेतावनी दे रहे हैं। इस तनाव का कारण है ताइवान जिसपर
चीन अपना अधिकार चाहता है। लेकिन वैश्विक दबाव में वह आगे बढ़ने की पूरी हिम्मत
नहीं कर पाता है। वर्तमान में चीन और जापान के बीच जो तनाव बढ़ा है इसके पीछे
मुख्य कारण क्या है आइये जानते हैं और समझते हैं कि यदि इन दोनों देशों के बीच युद्ध
हुआ तो हालात क्या होंगे।
इस
संकट का मुख्य कारण है ताइवान और विवादित द्वीप हैं। यह मौजूदा संकट जापान की नई
प्रधानमंत्री साने तकाइची (Sanae Takaichi) के उस बयान के बाद शुरू हुआ, जिसमें उन्होंने संकेत
दिया कि अगर चीन ताइवान पर हमला करता है, तो यह जापान के "अस्तित्व के लिए
खतरा पैदा करने वाली स्थिति" होगी। जापान के 2015 के
सुरक्षा कानून के तहत, ऐसी स्थिति में टोक्यो अमेरिका और
अन्य सहयोगियों के साथ सैन्य हस्तक्षेप कर सकता है।
चीन की कड़ी प्रतिक्रिया
चीन
ने इस बयान पर कड़ा विरोध जताते हुए इसे अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप बताया।
- सैन्य चेतावनी: चीन ने जापान को चेतावनी दी है कि यदि उसने ताइवान
के मामले में सैन्य हस्तक्षेप करने की हिम्मत की, तो
उसे "करारी हार" का सामना करना पड़ेगा।
- राजनयिक विवाद: बीजिंग ने टोक्यो में अपने राजदूत को तलब किया और
जापान से इस बयान को वापस लेने की मांग की। जापान ने भी चीनी राजदूत को
बुलाकर विरोध दर्ज कराया है।
- यात्रा चेतावनी: चीन ने अपने नागरिकों के लिए जापान यात्रा को लेकर
सुरक्षा चेतावनी जारी की है, जिससे पर्यटन और आर्थिक
संबंधों पर असर पड़ा है।
विवादित द्वीप और सैन्य गतिविधियाँ
ताइवान
के अलावा, पूर्वी चीन सागर में स्थित सेनकाकू/दियाओयू
(Senkaku/Diaoyu) द्वीपों पर भी तनाव बना हुआ है, जिन पर दोनों देश दावा करते हैं। हाल ही में, चीनी
तट रक्षक जहाज इन द्वीपों के आसपास जापानी प्रशासित जल क्षेत्र में गश्त करते देखे
गए, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।
फिलहाल युद्ध की संभावना कम
हालांकि
दोनों देशों के बीच जुबानी जंग और सैन्य हलचल बढ़ी है, विश्लेषकों का मानना है कि पूर्ण सैन्य
टकराव की संभावना अभी कम है। दोनों देश बड़े व्यापारिक भागीदार हैं, और दोनों पक्षों के अधिकारी राजनयिक स्तर पर तनाव कम करने की कोशिश कर रहे
हैं।
जापान
ने अपने नागरिकों को चीन में सतर्क रहने की सलाह दी है, जबकि चीन ने जापानी फिल्मों की रिलीज टाल
दी है। स्थिति नाजुक बनी हुई है और आगे का घटनाक्रम दोनों देशों की राजनयिक
प्रतिक्रियाओं पर निर्भर करेगा।

चीन
और जापान के बीच विवाद के कारण
चीन
और जापान के बीच तनाव के मुख्य कारण कई दशकों पुराने हैं, जिनमें ऐतिहासिक विवादों से लेकर समकालीन
भू-राजनीतिक और क्षेत्रीय मुद्दे शामिल हैं। इन कारणों को प्रमुख श्रेणियों में
बांटा जा सकता है:
1. क्षेत्रीय विवाद ( Territorial Disputes)
- सेनकाकू/दियाओयू द्वीप समूह: पूर्वी चीन सागर में स्थित निर्जन द्वीपों के एक छोटे समूह को लेकर
दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा क्षेत्रीय विवाद है। जापान इन द्वीपों को
"सेनकाकू" कहता है, जबकि
चीन इन्हें "दियाओयू" कहता है।
- इन द्वीपों का रणनीतिक महत्व है क्योंकि ये
महत्वपूर्ण नौवहन मार्गों के करीब हैं, और माना जाता है कि इनके आसपास के जल क्षेत्र में तेल और गैस के
प्रचुर भंडार हैं।
- जापान इन द्वीपों का प्रशासन करता है, लेकिन चीनी तटरक्षक जहाज और सैन्य
पोत नियमित रूप से इस क्षेत्र में गश्त करते हैं, जिससे
तनाव बढ़ता है।
2. ऐतिहासिक मुद्दे (Historical Issues)
- द्वितीय विश्व युद्ध की कटु यादें: दोनों देशों के बीच लंबे समय से
चली आ रही दुश्मनी का एक बड़ा कारण द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जापानी सेना
द्वारा चीन में किए गए क्रूर अत्याचार हैं, जिसमें 1937
का नानजिंग नरसंहार भी शामिल है। जिसमें महिलाओं औऱ बच्चों
समेत अनुमानित दो लाख लोगों की हत्या की गयी थी।
- अपर्याप्त माफी की धारणा: चीन का मानना है कि जापान ने अपने
युद्ध कालीन अपराधों के लिए कभी भी पर्याप्त रूप से माफी नहीं मांगी है।
- यासुकुनी तीर्थ (Yasukuni Shrine) का दौरा: जापानी राजनेताओं द्वारा टोक्यो
स्थित यासुकुनी तीर्थ का दौरा करना चीन को नाराज करता है, क्योंकि वहां युद्ध अपराधियों को भी सम्मानित किया गया है। चीन इसे
जापान द्वारा अपने सैन्य इतिहास का महिमामंडन मानता है।

3. ताइवान मुद्दा (Taiwan Issue)
- "एक चीन" नीति बनाम जापानी
सुरक्षा: चीन
ताइवान को अपना अभिन्न अंग मानता है और बल प्रयोग करके भी उस पर नियंत्रण
हासिल करने से इनकार नहीं करता है।
- जापान का सुरक्षा रुख: जापान ने हाल ही में स्पष्ट किया
है कि चीन द्वारा ताइवान पर हमला करना उसके लिए "अस्तित्व के लिए खतरा
पैदा करने वाली स्थिति" होगी, जिसका अर्थ है कि
जापान इसमें सैन्य हस्तक्षेप कर सकता है। जापान का यह रुख चीन को अपने आंतरिक
मामलों में हस्तक्षेप लगता है, जिससे मौजूदा राजनयिक
संकट पैदा हुआ है।
4. सुरक्षा और सैन्य प्रतिस्पर्धा (Security and Military
Competition)
- बढ़ता सैन्यीकरण: चीन अपनी सैन्य क्षमताओं का तेजी से निर्माण कर रहा
है, जिसे जापान अपनी सुरक्षा के लिए खतरे के रूप में
देखता है।
- अमेरिका के साथ गठबंधन: जापान, अमेरिका
के साथ अपने सुरक्षा गठबंधन को मजबूत कर रहा है, जिसे
चीन अपने खिलाफ एक "घेराव रणनीति" के रूप में देखता है।
- सैन्य अभ्यास: दोनों पक्षों द्वारा एक-दूसरे के आसपास के क्षेत्रों में सैन्य
अभ्यास और नौसैनिक गतिविधियां तनाव को और बढ़ाती हैं।

2025 के नवीनतम अनुमानों के अनुसार, सैन्य शक्ति की तुलना
संख्या बल बनाम गुणवत्ता का एक स्पष्ट उदाहरण है, जिसमें चीन संख्यात्मक रूप से हावी है और जापान अपनी
उच्च-तकनीकी क्षमताओं के लिए जाना जाता है।
सैन्य शक्ति की तुलना (2025)
चीन
(पीपुल्स लिबरेशन आर्मी - PLA)
- वैश्विक रैंकिंग: ग्लोबल फ़ायरपॉवर इंडेक्स 2025 में दुनिया की तीसरी सबसे शक्तिशाली सेना।
- सक्रिय सैनिक: लगभग 20 लाख से अधिक सक्रिय सैन्यकर्मी,
जो दुनिया में सबसे अधिक हैं।
- रक्षा बजट: लगभग 230 अरब डॉलर (या इससे अधिक, अनुमान भिन्न हो सकते हैं), जो
जापान से काफी बड़ा है।
- उपकरण:
- वायुसेना: 3,000
से अधिक विमान, जिसमें 1,200 से अधिक लड़ाकू विमान शामिल हैं।
- नौसेना: 750
से अधिक नौसैनिक संपत्तियां (जहाज और पनडुब्बियां), जिसमें तीन विमान वाहक पोत शामिल हैं।
- भूमि सेना: 6,800
से अधिक टैंक और 144,000 से अधिक
बख्तरबंद वाहन।
- परमाणु क्षमता:
चीन
के पास सैकड़ों परमाणु हथियार हैं।
- ताकत का आधार: विशाल संख्या बल, बड़ी औद्योगिक क्षमता,
तेजी से आधुनिकीकरण और मिसाइल प्रणालियों पर जोर।
जापान
(जापान सेल्फ-डिफेंस फोर्सेज - JSDF)
- वैश्विक रैंकिंग: ग्लोबल फ़ायरपॉवर इंडेक्स 2025 में दुनिया की आठवीं सबसे शक्तिशाली सेना।
- सक्रिय सैनिक: लगभग 240,000 सैन्यकर्मी।
- रक्षा बजट: लगभग 53 अरब डॉलर।
- उपकरण:
- वायुसेना: 1,400
से अधिक विमान।
- नौसेना: लगभग 160 नौसैनिक संपत्तियां, जो तकनीकी रूप से काफी उन्नत हैं।
- भूमि सेना: लगभग 521 लड़ाकू टैंक।
- परमाणु क्षमता:
जापान
के पास कोई परमाणु हथियार नहीं है।
- ताकत का आधार: उच्च तकनीक वाले आधुनिक उपकरण, बेहतरीन
प्रशिक्षण, पनडुब्बी रोधी युद्ध (anti-submarine
warfare) क्षमता, और अमेरिकी सहयोग (F-35
जैसे उन्नत लड़ाकू विमानों की खरीद)।
संक्षेप
में,
चीन के पास संख्यात्मक और बजटीय रूप से भारी बढ़त है, जबकि जापान की
सेना छोटी लेकिन अत्यधिक तकनीकी रूप से परिष्कृत है
और उसे अमेरिका के साथ मजबूत सुरक्षा गठबंधन का समर्थन प्राप्त है।