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कैसे हुआ एनडीए का चमत्कार और क्यों टूटी महागठबंधन की पतवार


Monesh Srivastava
Editor-In-Chief

-          एनडीए के बंपर जी और महागठबंधन की कमर तोड़ हार का क्या रहा कारण
-          सीट बंटवारे से लेकर, चुनावी रणनीति में बेहतर दिखी एनडीए

-          कांग्रेस - आरजेडी और राहुल-तेजस्वी में नहीं दिखा तालमेल

        

       Editor Desk. बिहार विधानसभा चुनाव परिणाम ने सभी को अचंभित करके रख दिया, कहीं इसे चमत्कार कहा जा रहा है, कहीं मोदी और नीतीश की बयार के तौर पर विश्लेषित किया जा रहा है। लेकिन एक फैक्टर कही पीछे छूटता दिख रहा है वह है बिहार की जनता का मूड। बिहार की जनता को अक्सर कमतर आंका जाता रहा है और दबे स्वर संज्ञा ये दी जाती रही है कि जातिवाद में बिहार पूरी तरह से लिप्त है और उसी दम पर ये चुनाव जीता जा सकता है। पुरानी परिपाटी यही कहती भी है, लेकिन इस चुनावी परिणाम ने सारे कयास और प्रयास को धता बताते हुए विकास और सुशासन के मॉडल को चुन लिया और बिहार की जनता ने एक सवाल छोड़ दिया कि बिहारियों समझना आसान नहीं नामुमकिन सा है।

    वहीं सवाल ये भी उठता है कि बिहार चुनाव में महागठबंधन की इतनी बुरी हार क्यों हुई, कैसे हुई। राजनीति पुरोधा भी इस जनमत का आंकलन कर पाने में नाकाम साबित हुए। ग्राउंड जीरो पर चुनावी रिपोर्टिंग करने वाले विश्लेषक चित हो गये। बताया तो ये तक जा रहा था कि बिहार में मोदी और नीतीश की कोई आंधी चल ही नहीं रही थी, तो फिर ये जनमत जमीन पर उतरा कैसे। आइये जानने की कोशिश करते हैं।

        बिहार वह धरती है जो भारत को राजनीति का ककहरा देती है, इसी भूमि के आचार्य चाणक्य ने एक साधारण से व्यक्ति को सम्राट बना दिया था। ये धरती बड़े – बड़े राजनीतिज्ञों की जन्म स्थली है। इसे समझना इतना आसान भी नहीं है।  बिहार की जनता के मन में क्या था ये परिणाम आने से पहले जाहिर नहीं हो पाया। यदि इस चुनाव को सिलसिलेवार समझें तो पहले बात करनी होगी महा गठबंधन की। जिसका प्रमुख चेहरा थे तेजस्वी यादव, जिन्होंने बिहार में अपनी राजनैतिक जमीन काफी हद तक बना ली थी, लेकिन इस चुनाव में उसे गंवा बैठे। इसके पीछे कई कारण है पहला कारण उनकी पार्टी की छवि, पिता के कारनामे से वह पीछा नहीं छुड़ा पाये। वहीं चुनाव के शुरुआती दौर से ही महा गठबंधन का आपसी तालमेल बेताल हुआ पड़ा था। तेजस्वी का बंटाधार करने के लिए उन्हें किसी और की आवश्यकता नहीं थी, उनके पिता का जंगल राज ने ही काफी काम कर गया। वहीं पार्टी की महिला प्रवक्ताओं ने रही सही कसर पूरी कर दी। टीवी चैनलों पर संवाद में उनकी विवादित और अमर्यादित भाषा ने जमकर वोट कटवायें। लग रहा था कि महागठबंधन ने बिहार के वोटरों को अनपढ़ और गंवार समझ लिया और यही सबसे बड़ी गलती थी। 

अपनी बहन के साथ बदसलूकी

लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिनी आचार्य जिन्होंने अपने पिता को किडनी देकर जान बचायी थी उन्हें अपमानित और तिरस्कृत करके घर से निकाल दिया गया, रोहिनी ने शनिवार को ये आरोप उनपर लगाया जिनपर राष्ट्रीय जनता दल का दरोमदार है। रोहिनी ने मीडिया को बताया कि संजय यादव और रमीज खान को पार्टी की हार का कारण बताया। रोहिनी ने एक्स पर पोस्ट भी साझा किया है जिसमें उन्होंने लिखा कि "कल मुझे गालियों के साथ बोला गया कि मैं गंदी हूँ और मैंने अपने पिता को अपनी गंदी किडनी लगवा दी , करोड़ों रूपए लिए , टिकट लिया तब लगवाई गंदी किडनी .. सभी बेटी - बहन , जो शादीशुदा हैं उनको मैं बोलूंगी कि जब आपके मायके में कोई बेटा - भाई हो , तो भूल कर भी अपने भगवान रूपी पिता को नहीं बचाएं , अपने भाई , उस घर के बेटे को ही बोले कि वो अपनी या अपने किसी हरियाणवी दोस्त की किडनी लगवा दे " .. सभी बहन - बेटियां अपना घर - परिवार देखें, अपने माता - पिता की परवाह किए बिना अपने बच्चे , अपना काम, अपना ससुराल देखें , सिर्फ अपने बारे में सोचें .. मुझसे तो ये बड़ा गुनाह हो गया कि मैंने अपना परिवार, अपने तीनो बच्चों को नहीं देखा , किडनी देते वक्त न अपने पति, न अपने ससुराल से अनुमति ली .. अपने भगवान, अपने पिता को बचाने के लिए वो कर दिया जिसे आज गंदा बता दिया गया .. आप सब मेरे जैसी गलती , कभी , ना करे किसी घर रोहिणी जैसी बेटी ना हो"

रोहिनी के साथ हुई इस घटना ने राजनीति में हलचल मचा दी है।

टिकट को लेकर सिर फुट्टवल

          सीट बंटवारे को लेकर भी तेजस्वी की पार्टी में बहुत विवाद, विद्रोह देखने को मिला। एक कार्यकर्ता ने पार्टी कार्यालय के बाहर अपना कुर्ता फाड लिया और आरोप लगाया कि संजय यादव ने पैसा लिया लेकिन टिकट नहीं दिया। चुनावी सभाओं कार्यकर्ताओं की अभद्रता, गुंडों वाली छवि खुलकर सामने आयी। इतना ही नहीं पूरा चुनाव आरजेडी सिर्फ तेजस्वी के चेहरे पर ही लड़ती रही है यानी परिवार वाद साफ दिखा और आरजेडी में लालू परिवार को छोड़कर कोई नेता ठीक ठाक छवि वाला भी नहीं था, वहीं तेजस्वी ने रमीज खान को साथ जोड़ रखा था जो एक अपराधी है और उसपर कई मुकदमें दर्ज है और हत्या का भी आरोप है। जिसका परिणाम ये था कि नेतृत्व और संगठनकर्ताओं की कमी ने बट्टा लगाया है।

      तेजस्वी यादव ने भी ब्लंडर किया तीन करोड़ नौकरी देने का वादा करके, सोचा की बिहार की जनता पढ़ी लिखी तो है नहीं वेतन का गणित क्या लगा पायेगी, और इसी में गच्चा खा गये। नौकरी के लिए खर्च होने वाले बजट के सवाल पर आये, बाये, साय बांचने लगे।

कांग्रेस को कर दिया किनारे

        बिहार चुनाव में कुछ सभाएं छोड़कर कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी नदारत रहे, क्योंकि महागठबंधन का सबसे बड़ा चेहरा होने के बाद भी उनके सहयोगी तेजस्वी ने उन्हें दर किनारे कर दिया। पहले राहुल और कांग्रेस पोस्टरों से गायब होने लगे फिर सभाओं से भी लुप्त हो गये। वहीं कांग्रेस और राहुल गांधी की ओर से बिहार चुनाव में राज्य की समस्या और समाधान की ओर फोकस करने के बजाए उनका भाषण पुराने राग अलापता दिखा। जिसमें भाजपा द्वारा संविधान बदल देने की बात छेड़ने लगे, जो शायद बिहार के वोटरों को पसंद नहीं आयी।

 

एनडीए ने कैसे किया 202 का चमत्कार

        इसमें दो राय नहीं है कि बिहार राज्य जातिगत द्वेष से जकड़ा हुआ है और हर चुनाव में जाति का समीकरण हर पार्टी को बैठाना ही पड़ता है 2025 के चुनाव में भी ऐसा था तो लेकिन इस जातिगत राजनीति की तीव्रता काफी कम रही। एनडीए में भाजपा सवर्णों की पार्टी के तौर जानी जाती है वहीं जेडीयू समाजवादी विचार धारा पर चलने वाली है। दोनों का गठजोड़ अगड़ो और पिछड़ों को साधने में कारगर रहा। लेकिन इसमें एक बात जिसे नजर अंदाज नहीं किया जा सकता है वह है केंद्र में मोदी नेतृत्व सरकार के कार्य को उनके द्वारा चलायी जा रही योजनाओं और रुकावट रहित विकास कार्य, वहीं नीतीश कुमार का बिहार में सुशासन बहुत कारगर साबित हुआ है। भ्रष्टाचार हर सरकार में होता है लेकिन यदि नेतृत्व बेदाग होता है तो जनता उसे सराहती है, और यही नीतीश की बेदाग छवि ने उन्हें जनता की पसंद बनाए रखा।

शराब बंदी को नहीं भूलना चाहिए

        एक औऱ महत्वपूर्ण कार्य जिसकी चर्चा होना अति आवश्यक है वह है शराब बंदी, जिसे नीतीश सरकार ने जारी रखा। शराब उन राज्यों के भयंकर महामारी बन जाती है जहां बेरोजगारी है, शराब से सबसे ज्यादा नुकसान उठाती है महिला, परिवार बर्बाद होता है, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है, घर की माली हालत टूट जाती है। ऐसे में शराब बंदी ने महिलाओं को बहुत सहयोग दिया और यही कारण था कि इस चुनाव में महिलाओं ने बढ़-चढ़ कर 71 प्रतिशत तक अपने मताधिकार का प्रयोग किया। नीतीश ने महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा पर भी जो दिया है और प्रदेश में महिला सुरक्षा को लेकर गंभीर भी रहे हैं, अपराध में कमी, राजनीति का अपराधीकरण पर रोक लगाये रखना ये नीतीश के लोकप्रियता का कारण रहा है।

सीट बंटवारे में बारीकी, मिला बेहतर परिणाम

        एनडीए की चुनावी रणनीति की बात की जाए तो चुनाव में आपसी तालमेल बेहतर देखने को मिला, चाहे वह सीट बंटवारा हो या समीकरणों के मुताबिक चेहरों को आगे लाना। साथ ही सीटों का बंटवारा भी ऐसा हुआ कि सभी पार्टियों ने 80 प्रतिशत सीटे जीती, जैसे भाजपा 101 सीट पर चुनाव लड़ी और 89 सीट जीती, जदयू 101 सीटों पर चुनाव लड़ी और 85 सीट हासिल किया, वहीं चिराग पासवान की पार्टी एलजेपी (आरवी) को चुनावी मैदान में 29 सीटे मिली, जिनमें से एक नामांकन रद्द होने के चलते 28 सीटों पर चुनाव लड़कर 19 सीटें जीती। जीतन राम माझी की पार्टी हिन्दुस्तान आवामी मोर्चा ने 6 सीट पर चुनाव लड़ा और 4 सीट हासिल की तथा उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने 6 सीट पर चुनाव लड़कर 4 सीट पर जीत हासिल की। इन आंकड़ों को देखे तो आपको समझ आयेगा कि सीट बंटवारे में कितनी बारीकी से समीकरण निर्धारित किया गया जिसका परिणाम सभी पार्टियों को अच्छा मिला। 

 

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